अयोध्या विवाद: सिब्बल बोले- NDA के एजेंडे में राम मंदिर, अब 8 फरवरी 2018 को होगी अगली सुनवाई

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  • December 5, 2017
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68 साल पुराने राम मंदिर बाबरी मस्जिद विवाद पर आज से सुप्रीम कोर्ट में निर्णायक सुनवाई शुरू हो गई है. आज हुई सुनवाई के दौरान सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से कपिल सिब्बल ने कोर्ट से मांग की है कि इस मामले की सुनवाई को 2019 लोकसभा चुनाव तक टाला जाना चाहिए. कपिल सिब्बल ने कहा कि मामले की सुनवाई 2019 में होने वाले आम चुनाव के बाद शुरू की जानी चाहिए. इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 8 फरवरी 2018 को होगी.

कपिल सिब्बल के तर्क

-मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट में सुनवाई का बहिष्कार करने की धमकी दी.

-सुप्रीम कोर्ट के सामने अभी सारे दस्तावेज नहीं लाए गए.

-अनुवाद करवाए गए 19950 पन्नों के दस्तावेज कोर्ट में जमा होने चाहिए.

-अयोध्या में हुई खुदाई पर एएसआई की पूरी रिपोर्ट भी अभी रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं.

-इस मामले के रिकॉर्ड में दस्तावेज अभी अधूरे हैं

-5 से 7 जजों की बेंच 2019 आम चुनाव के बाद सुनवाई करे.

-देश में ऐसा माहौल नहीं कि सुनवाई सही तरीके से हो सके.

-राम मंदिर एनडीए के एजेंड़ा में शामिल.

-कोर्ट को देश में गलत संदेश नहीं भेजना चाहिए.

-सुब्रमण्यम स्वामी इस मामले में कोई पार्टी भी नहीं.

यह एक राजनीतिक मामला, सुनवाई 2019 तक टले

सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से कपिल सिब्बल ने कहा कि ये एक राजनीतिक मामला है और अभी रिकॉर्ड में दस्तावेज भी अधूरे है. सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल और राजीव धवन ने इस पर आपत्ति जताते हुए सुनवाई के बहिष्कार की बात कही है.

राम मंदिर एनडीए के घोषणा पत्र का हिस्सा- सिब्बल

सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने कहा है कि राम मंदिर एनडीए के घोषणा पत्र का हिस्सा है इसलिए 2019 के बाद ही इसको लेकर सुनवाई होनी चाहिए.

कोर्ट अब राजनीति पर ध्यान न दें-हरीश साल्वे

कपिल सिब्बल की इस बात का यूपी सरकार के वकील तुषार मेहता ने जवाब देते हुए कहा कि जब दस्तावेज सुन्नी वक्फ बोर्ड के ही हैं तो ट्रांसलेटेड कॉपी देने की जरूरत क्यों हैं? वहीं रामलला का पक्ष रख रहे हरीश साल्वे ने कहा है कि सुनवाई कर रही बेंच को अब राजनीति पर ध्यान नहीं देना चाहिए.

कुल 13 अपील दायर

राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कुल 13 अपील दायर की गई है. इनमें वे याचिकाएं भी हैं जिनमें इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के साल 2010 के आदेश को चुनौती दी गई है. अब सुप्रीम कोर्ट में  चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले और पक्षकारों की दलीलों के मद्देनजर ये तय करेगी कि आखिर इस मसले का निपटारा कैसे किया जाए.

सुप्रीम कोर्ट में आज से शुरू हुई सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के अलावा जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस.अब्दुल नजीर भी बेंच में शामिल है. इस मसले पर सभी पक्षकारों ने अपनी अपनी बात कोर्ट में पुख्ता तौर पर रखने का मन बना लिया है.

आप को बता दें कि साल 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित स्थल के 2.77 एकड़ क्षेत्र को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और रामलला के बीच बराबर-बराबर बांटा था. जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में हुई पिछली सुनवाई में कोर्ट ने इसे गंभीर मानते हुए कहा था कि सबसे पहले यह तय किया जाएगा कि विवादित भूमि पर किसका अधिकार है. सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई में कहा था कि भूमि विवाद को सुलझाने के बाद ही पूजा-अर्चना का अधिकार आदि मसलों पर बाद में सुनवाई होगी.

वहीं रामलला विराजमान के पक्षकार महंत धर्मदास ने कोर्ट में सुनवाई होने से पहले कहा है कि सभी सबूत, रिपोर्ट और भावनाएं मंदिर के पक्ष में हैं. धर्मदास ने कहा है कि बाबरी ढ़ाचे से पहले वहां मंदिर था जिसे जबरन हटाकर मस्जिद बनाई गई थी, लेकिन बाद में फिर मंदिर की तरह वहां राम लला की सेवा पूजा होती रही. धर्मदास ने कहा है कि सबूत और कानून हमारे साथ है.

 

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